इंदौर के भंवरकुआं के पास भोलाराम मार्ग पर कुछ अपने ख़ुद के सपने लिये, तो कुछ अपने अभिभावकों द्वारा चुनें गये सपने लिये और तो कुछ दूसरों की सफलता से प्रेरित हो कर उस सफलता को अपना सपना बना लेने वाले लोग अक्सर इस भीड़ भरी सड़क पर और भारी भीड़ पैदा कर देते हैं। इसी जगह में भी कोई तो अपना सपना लेकर यहाँ कुछ साल रहा हूँ यह किस्सा उन्हीं सालों में से किसी एक साधारण दिन का है।
शाम के समय मैं अक्सर भोलाराम से भंवरकुआं चौराहे तक घूमने निकलता था, उस शाम को भी मैं पैदल घूमने निकला। भोलाराम से डीडी गार्डन, डीडी गार्डन से विष्णु पुरी और फिर आगे गिरिराज टॉवर। शाम के समय इस सड़क पर बहुत से लोग मेरी तरह ही घुमने निकलते है कुछ वजह के साथ तो कुछ मेरी तरह बेवजह। टहलते हुए गिरिराज टॉवर पहुँचा वहां एक राम जी चाय वाले थे हालांकि सब उसे मीनाक्षी चाय कहकर बोलते थे क्योंकि उस दुकान के सामने मीनाक्षी गर्ल्स हॉस्टल है। वहाँ चाय पी रहा था, तभी एक छोटा सा लड़का करीब 10 से 12 साल का मेरे पास आकर पैसे माँगने लगा। मैंने अपनी जेब से पर्स निकाला और कुछ देने के लिये देखने लगा पर मुझे 500, 100 और 50 के नोट अलावा कुछ नहीं दिखा तो मैंने उसे इशारे से मना कर दिया कि देने को मेरे पास कुछ नहीं है, वो मेरे पास से तो चला गया पर वहीं दूसरे लड़के लड़कियों से पैसे लेता रहा। मैं वहीं बैठा उसे देखता रहा, कुछ ने उसे मेरी तरह ही मना कर दिया तो किसी ने 1 या 2 रुपये दे दिये। वहीं मैंने देखा एक कार में पति, पत्नी और उनका 10 से भी कम उम्र का बच्चा बैठा हुआ था, उस कार वाले बच्चें ने अपने पापा से ज़िद करते हुए 20 रुपये हासिल किए। वह कार वाला बच्चा उस पैसे मांगने वाले बच्चे को आवाज दे कर बुलाता है और वो पैसे उसे दे देता है। मैं अभी भी उस पैसे लेकर जाने वाले बच्चे पर नज़र रखें हुए था। वो बच्चा वहीं पास की दुकान से बेक समोसा लेता है और मुझसे थोड़ी दूर बैठ कर खाने लगता है। मैं उसे ही देख रहा था कि उसकी नज़र मुझ पर पढ़ गयी, उसने देखा मैं उसे ही देख रहा हूँ तो वह मेरे पास आगया और इशारे से ही खाने का पूछा। मैं उसकी इस मासूमियत को देख थोड़ा लज्जित भी हुआ और खुश भी हुआ। उस बच्चे के पास वो बेक समोसा ही उसकी पूरी दौलत थी, पर उसने एक पल भी नहीं सोचा उस दौलत को मुझसे बांटने से पहले और मेरे पास इतने पैसे होने के बाद भी खुल्ले पैसे खोज रहा था उसको देने के लिए। मैंने उस बच्चे से उसका नाम पूछा। उसने अपना नाम बहुत ही दमदार और फिल्मों के किसी हीरो की तरह अपना नाम राजा बताया।
मैंने राजा से पूछा-"तुम मुझे यह दे देगो तो तुम्हारे पास क्या बचेगा?"
राजा ने कहा-"भैया, मैं पूरा थोड़ी दे रहा हूँ। आधा आप खा लो और आधा मैं खा लूंगा।"
मैंने कहा-"आधा खाने से तुम्हारा पेट भर जायेगा।"
राजा-"नहीं पर कम से कम हम एक समोसे से दोनों को कुछ देर तक खाने की ज़रूरत नहीं होगी न।"
मैं उसकी इस बात से और भी ज्यादा प्रभावित हुआ और थोड़ा सा ही सही उसके पास से छोटा सा टुकड़ा ले लिया और उससे पूछा कुछ और खाना है?
राजा-" नहीं भैया। हो गया मेरा तो।"
मैंने-"मैंने उसे अपने साथ लेजाकर उससे उसकी पसंद का पूछा कि क्या खाओगे।"
राजा-"भैया एक और बेक समोसा ले लेते है हम दोनों का हो जायेगा।"
मैंने उसे समोसा दिला दिया और अपना हिस्सा लिए बिना ही जाने लगा।
उसने आवाज़ दी भैया आप नहीं खाओगे। मैंने न का इशारा कर दिया और अपने कमरे की तरफ़ जाने लगा और सोचता रहा राजा के बारे में।
उसका राजा नाम कितना सही था यथा नाम तथा गुण।
राजा यही तो करते है जो उनके पास होता है उस पर वो अपना अकेले का हक़ नहीं मानते है वो अपने पास जितना है उतना सब भी अपनी प्रजा के हित में देने को तत्तपर रहते है।
वो गाड़ी वाले बच्चे को राजा की भूख दिख गयी और मुझे या हम में से वहाँ खड़े किसी को वो भूख नहीं दिखी।
राजा ने मेरा अकेलापन देख कुछ देर मेरे साथ रहना चुना था।
बच्चे जो देख लेते है हम बड़े होने के बाद वो क्यों नहीं देख पाते, काश हम फिर बच्चों जैसे सोच पाते।
-हिम
👏 👌🏻
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जवाब देंहटाएंVery Nice...
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जवाब देंहटाएं🙏🙏 shi kha bhai
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जवाब देंहटाएं👌🏻😊superb
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जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंकुछ बाते जो आजकल हमारे हाथों में चमकते हुए खिलौने में व्यस्त होने के कारण कई बार लोग नजरंदाज करते हैं क्योंकि वक्त ही नहीं हैं रुकने के लिए, किसी होठों पर भूख और सच्चाई देख लेने तक रुकने के लिए।
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