बुधवार, 2 मार्च 2022

विदाई

  हरिद्वार मतलब भगवान विष्णु के घर का दरवाजा, भारत में इस पूरे इलाके को देवभूमि नाम से भी पुकारा जाता हैं। हरिद्वार में हर की पौड़ी पर हर कोई माँ गंगा की आरती देखने ज़रूर आता हैं। हर की पौड़ी पर तर्पण करने की मान्यता है कि जिस भी परिजन का यहाँ तर्पण किया जाता है वह जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है, तो यही हर की पौड़ी पर ही रात के ग्यारह बजे भी चहल-पहल हो रही थी, कुछ यात्री इतनी रात को भी माँ गंगा के घाट पर सुकून की तलाश में घूम रहे हैं, ठण्डी हवा लोगों को माँ गंगा को छूने से रोकने की चेतावनी दे रही है, पर वहीं एक लड़की जिसका नाम विभा है वह माँ गंगा में अपने दोनों पैर डूबाकर एक टक निगाह से बहते पानी को देख रही है। लोग उसे आश्चर्य से देखते हुए आगे बढ़ते जा रहे हैं क्योंकि पानी इतना ठण्डा है कि कोई माँ गंगा में अपना हाथ भी भिगाता है, तो तुरंत बाहर निकाल लेता है और यह काले सूट में खुले बालों वाली लड़की कितनी देर से पैर डूबा कर बैठी हैं। अचानक विभा के पैर से एक दीपक आकर टकरा कर रुक जाता है, विभा उस दीपक को हाथ में उठा लेती है तभी उस दीपक को जिसने गंगा जी में विसर्जित किया था वह लड़का अब विभा की तरफ आता है और उससे कहता है कि यह दीपक मेरा हैं।

तब विभा उसकी तरफ देखते हुए कहती है कि यह दीपक तुम्हारा था अब माँ गंगा का है और यह कह कर फिर से उस दीपक को माँ गंगा में प्रवाहित कर देती है। वह लड़का तब विभा से कहता है मेरा नाम अंकित है।

विभा यह सुनकर भी उसे अनसुना कर देती है।

अंकित फिर बात शुरू होने की उम्मीद में उससे थोड़ी ही दूरी पर घाट पर ही बैठ जाता हैं। 

विभा उसे देख लेती है कि वह लड़का उससे थोड़ा दूर बैठ कर उसकी तरफ बार-बार देख रहा है और इस पर विभा उसे मन ही मन भला-बुरा कहती है।

अब बारह बजने को हो आयी थी लोगों की आवाजाही भी अब कम होती जा रही थी तो अंकित ने यह देखते हुए विभा से पूछ लिया-"आप कुछ परेशानी में है?"

विभा ने गुस्से से उसे जवाब दिया-"तुमसे मतलब!"

अंकित-"काफ़ी देर से आपको ऐसे अकेले घाट पर बैठे देख रहा हूँ। गंगा आरती के बाद से आप यहाँ से हिले तक नहीं है, इसीलिये आपसे पूछा। काफी देर हो गयी है, आपको यहाँ ऐसे अकेले नहीं बैठना चाहिए।"

विभा-"तुम्हे मेरी फिक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं हैं।"

अंकित -"हाँ, हम होते भी कौन है पूछने वाले? वैसे आप गंगा में कूदने की सोच रही हो तो कूद जाना था अब तक, क्योंकि कितने भी देर यहाँ ऐसे ही बैठे रहोगे तब भी पानी गर्म नहीं होने वाला है।"

विभा-"बड़े ही बत्तमीज आदमी हो। तुमको क्यों लगा कि मैं मरने आयी हूँ?"

अंकित-"आपके आँसूओं को गंगाजी में मिलते देखकर  वहाँ दूर बैठें-बैठें अंदाज़ा लगाया।"

विभा-"मुझ पर नज़र रखें हुए हो।"

अंकित-"यही मान लीजिये।"

विभा-"वैसे यहाँ इतनों के बीच में मरना मुश्किल हैं अगर सच में मरना होता तो किसी बन्द कमरें में फाँसी पर झूलना पसन्द करती।"

अंकित-"सही बात हैं यहाँ कोई न कोई बचा ही लेगा या कम से कम बचाने की कोशिश करेगा।"

विभा-"जैसे अभी तुम आये हो।"

अंकित-"मतलब तुम सच में मरने वाली थी।"

इतने में एक हवलदार अपने पुलिसिया अंदाज़ में लठ लहराता हुआ उन दोनों कि तरफ आया और उन्हें डाँटते हुए बोला-"दोनों यहाँ क्या कर रहे हों? टाइम वाईम का कुछ ध्यान है? ऐ लड़की ये लड़का तुम्हारे साथ है या तुम्हें परेशान कर रहा है?"

विभा थोड़ा घबराती हुई कहती है-"ऐसा कुछ भी नहीं है!यह मेरे साथ ही है! अब हम यहाँ से जाते हैं।"

दोनों वहाँ से उठ कर साथ जाने लगते है।

पैदल ही मुख्य सड़क से होते हुए रेल्वे स्टेशन की तरफ विभा जाने लगती है अंकित इतनी रात को एक लड़की को ऐसे अकेले जाने नहीं दे सकता था तो वो भी उसके साथ उसी दिशा में जाने लगता है।

अंकित कुछ सोचते हुए विभा से कहता है-" तुमने झूठ क्यों बोला? तुम तो मुझे जानती भी नहीं हो।"

विभा-"मैं वहाँ इतनी देर से अकेले बैठी थी! कितने ही लोगों ने मुझे रोते हुए भी देखा होगा पर जिस एक अकेले आदमी ने मेरी परेशानी जानने की कोशिश की, वो तुम हो और तुम्हारी इस भलाई के लिए तुम्हें पुलिस से डण्डे तो न खिलवाती।"

अंकित-"भला हो तुम्हारा! वैसे तुम्हारा नाम क्या है? और तुम वहाँ कर क्या रही थी।"

विभा-"मेरा नाम विभा हैं।मैं विदा देने आयी थी अपनी पुरानी ज़िन्दगी की यादों को।"

अंकित-"(थोड़ा हिचकिचाते हुए उसके उलझे हुए जवाब को सुलझाने की कोशिश में)अच्छा तो विदाई दे दी अब।"

विभा-"हाँ!"

अंकित-"तुमने तो गंगा में प्रवाहित कुछ भी नहीं किया था?"

विभा-"किया था और तुमने देखा भी वो आँसू ही थे जो विदा करने आयी अब उनकी और ज़रूरत मुझे नहीं है।"

अंकित-"अच्छा तो यह बात थी।"

दोनों पैदल ही चलते-चलते रेल्वे स्टेशन पहुँच गये थे।विभा ने उसे बताया कि उसकी ट्रेन है तीन बजे दिल्ली की, इसीलिये वो दोनों वहीं ट्रेन का इंतज़ार करने लगे थे। विभा ने अंकित से शुक्रिया भी कहाँ था और उसे जाने की भी आज्ञा दे दी थी कि वो अब जाना चाहें तो जा सकता हैं, पर अंकित विभा को ट्रेन में बिठाकर ही जायेगा यह मन ही मन निश्चय कर चुका था।

दोनों रेल्वे स्टेशन की एक बैंच पर बैठे हैं।

अंकित अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिये पूछता है-"तुम दिल्ली रहती हो?"

विभा-" हाँ! अब दिल्ली ही रहती हूँ।"

अंकित-"अच्छा! तो पहले कहीं और रहती थी।"

विभा-"हाँ! अब मज़बूरी है वहीं रहने की।"

अंकित-"कैसी मज़बूरी?"

विभा-"अपने ही कर्मो का फल हैं।"

अंकित-"क्या मतलब?"

विभा-"मतलब यह कि करीब छः साल पहले मैं अपने घर से पैसे लेकर अपने प्रेमी के साथ घर से भागी थी और यहाँ दिल्ली आ गयी थी, यहाँ हम मेरे प्रेमी के मौसी के घर ठहरे थे कुछ दिन हम दोनों वहीं साथ रुके फिर एक दिन वो अपने कुछ ज़रूरी कागज़ात लेने अपने शहर से आये दोस्त के पास गया और फिर कभी नहीं आया। मुझे समझने में देर लगी कि वह सारे पैसे लेकर और मुझे वहाँ हमेशा के लिये छोड़ गया है अब मैं अपने घर भी नहीं जा सकती थी।"

इतने में ही ट्रेन ने स्टेशन पर आने से पहले ही हॉर्न की आवाज़ दी और ट्रेन वहाँ स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़ी हो गयी।

रात का समय था एक्सप्रेस गाड़ी थी ज्यादा देर रुकने वाली नहीं थी इसीलिये विभा ट्रेन के अपने डिब्बे में बैठ गयी।अंकित उसे डिब्बे की खिड़की से विदा दे रहा था कि ट्रेन चलने लगी। तभी एक आख़िरी सवाल अंकित ने जल्दी से विभा से पूछा कि दिल्ली में कहाँ रहती हो?

विभा ने सुनते ही जल्दी से अपना पूरा पता बोला पर ट्रेन के चलने के कारण वह सिर्फ इतना सुन पाया "जी बी रोड़"।

-हिम


(जी बी रोड़ दिल्ली में वेश्याओं के रहने की जगह)


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