बुधवार, 23 फ़रवरी 2022

सौदेबाजी

 गाँव की एक मात्र पक्की सड़क जिस पर आमतौर पर इक्का दुक्का ही गाड़िया चलती है और बाकी समय सड़क इतनी खाली रहती की सड़क से लगें विद्यालय के बच्चें उस पर खेल खेला करते हैं, अभी उसी पक्की सड़क पर कच्चे सपनों को लिये कई बच्चें अपने घर की ओर जा रहे है। उन्हीं में बिछियां,लाली और ज्योति तीनों बारहवीं कक्षा की सहेलियाँ धीरे-धीरे कदम रख बातें करती हुई अपने घर की राह पर चले जा रहे है।

लाली अपनी सहेली बिछियां से पूछती है- तूने तो आज गणित के मेडम के दिये पर्चे में कमाल कर दिया।

बिछियां - हाँ, मुझे पसंद है न इसीलिये। फिर मुझे भी तो मेडम की तरह स्कूल में पढ़ाना है, मुझे ही न आयेगा तो बच्चें हँसेंगे न मुझ पर। 

"हाँ, जैसे आज दिन में वो अंग्रेजी वाले मास्टरजी पर सब हँस रहे थे जब उन्होंने इंग्लिश की स्पेलिंग ही गलत लिख दी थी।" हँसते हुए ज्योति कहने लगी।

तीनों कक्षा की आज दिनभर में घटी घटनाओं पर चर्चा करती हुई कब अपने घर के सामने पहुँच गयी उन्हें पता ही नहीं चला।

घर के बाहर बिछियां को आँगन में बहुत से जूते देखने को मिले, वह सोच ही रही थी कि यह कौन मेहमान आये होंगे इतने में ही उसकी माँ घड़ी में समय देख पीछे के दरवाज़े से बाहर आ, उसे पीछे के दरवाज़े से अंदर ले गयी।

यह इतनी जल्दी हुआ कि बिछियां समझ ही नहीं पायी कि आज माँ पहली बार उसको ऐसे स्कूल से देर से आने पर आते ही बिना डाँटे घर में ले जाकर कपड़े अपने हाथों से क्यों बदल रही है।

बिछिया की माँ उसे साड़ी पहना देती है और घर में आये मेहमानों को पानी पिलाने को भेजती है। उसे यह अजीब लगता है कि जो माँ उसके खेल-खेल में साड़ी पहनने पर डाँटती थी वह आज खुद उसे साड़ी पहनाकर इन लोगों के सामने क्यों भेज रही हैं?

वो पानी पिलाकर जैसे वापिस अंदर कमरे में जाने को होती है कि उसे पीछे से लोगों में से किसी थोड़े बूढ़े की बात सुनायी देती है जो उसके बापू को कहता है कि - लड़की तो सुंदर है, हमारे सतीश के साथ खूब जोड़ी जमेगी।

तभी बिछियां की माँ कमरे के दरवाजे पर ही खड़ी हो कहती है- हाँ! लाखों में एक है हमारी बिछियां।

सतीश का बापू- तो हमारी तरफ से बात पक्की है। आप देख लो क्या सोचते हो।

बिछियां की माँ- बात तो तय तब ही हो गयी थी, जब यह सात बरस की थी। हमारी तरफ से भी हाँ ही है, पर आप अभी पैसे की बात कर लो, बाद की झिक-झिक न हो।

सतीश का बापू- पैसे भी तब ही तय कर दिये थे कि पच्चीस हज़ार देंगे।

बिछियां की माँ- सिर्फ पच्चीस हज़ार। महंगाई भी तो देखों पचास हज़ार से एक रुपया कम नहीं लेंगे और हमारी बेटी में कोई खोट थोड़े है जो हमें ब्याह की जल्दी हो। पचास हजार मंजूर हो तो बात पक्की।

सतीश का बापू- ठीक है, तय रहा सौदा।

इस तरह बिछियां की शादी तय हो जाती है पड़ोस के गाँव के सतीश के साथ जो दसवीं की कक्षा में चार बार फैल था।

इस तरह की सोदेबाज़ी वाली शादियां बड़े धूमधाम से इस गाँव में पहले भी कई बार हो चुकी थी उन्हीं शादियों की संख्या में एक और अंक का इज़ाफ़ा इस शादी के बाद हो जाता है।

शादी के बाद बिछियां जो कल तक ख़ुद व्यवस्थित नहीं रहा करती थी आज अपने ससुराल को व्यवस्थित करने के जतन में लगी रहती थी। घर में माँ के सिखाये रसोई के सब तरीकों का इस्तेमाल कर अपने ससुराल के सभी सदस्यों को ख़ुश करने की नाकामियाब कोशिश करती थक जाती थी।

ऐसे ही शादी के चार साल बीत जाते हैं इन चार सालों में एक बार भी वह अपने मायके नहीं जा पायी हैं, उसके सास ससुर भी अब इस दुनिया में नहीं रहे हैं। घर में अब सिर्फ उसका पति, उसकी छः माह की बच्ची और जो उस बच्ची के जन्म देने से लगभग मृत्युशैया से जिंदा लौटी बिछियां ही बाकी हैं।

बिछियां रोज सुबह-शाम उसके पति के मन पसन्द का खाना बनाती और उसके इस उपक्रम के बदले में उसका पति सतीश जो शराब के नशे में अपनी पत्नी जिसे वह सिर्फ पैसे देकर ख़रीदी हुई एक वस्तु के अलावा ज्यादा कुछ नहीं मानता था कि पिटाई इस गुस्से में करता था जैसे जुएँ में जो वह पैसे रोज हार के आता था उसकी जिम्मेदार यह बिछियां ही हो।

आज करवाचौथ का दिन है पर बिछियां के लिये हर रात जैसे अमावस की होती है पर उसने अपने इस पति की दीर्घायु के लिये करवा चौथ का व्रत कर लिया था।

 रात तो उसका पति किसी औरत को ही अपने साथ घर में ले आता है, यह देख दिनभर से भूखी प्यासी बिछियां गुस्से में आ कर उस औरत को गाली गलौच कर घर से बाहर करने का प्रयास करती है, उस अधमरी सी शरीर वाली बिछियां में इससे ज्यादा शक्ति थी भी नहीं कि वह और कुछ प्रयास कर पाती।

उसके पति सतीश को अपनी पत्नी की इस बत्तमीजी पर बहुत क्रोध आ जाता है और वह उसके किये की सज़ा देने के लिये अपने पौरुष का प्रदर्शन करते हुए उसे बेल्ट से बेल्ट के टूटने तक मारता है। 

वह बेहोश होने से पहले सिर्फ इतना देख पाती है कि उसका पति और वह औरत कमरें में चले जाते हैं और उसका पति कमरें का दरवाज़ा बन्द कर लेता है उसके बाद उसकी आँखें भी बंद हो जाती है और उसके कानों में उसकी बच्ची जो शायद दूध पीने के लिए रो रही है उसकी आवाज़ ही सुनायी देती है और पता नहीं चलता कब वह आवाज़ भी सुनायी देना बंद हो जाती है।

सुबह जब उसको होश आता है तब दिन के क़रीब ग्यारह बजे थे, घर में उसके और उसकी बेटी जो रात में भूख के कारण रोती-रोती ख़ुद ही सो गयी थी के अलावा कोई नहीं था। वह बीती रात के बारे में सोच कर हिम्मत कर घर से भागने की सोचती है और बच्ची को लेकर घर से निकल जाती है।

वह बस में बैठ पास के शहर पहुँच जाती है वह शहर ज्यादा बड़ा नहीं था पर उसके मायके और उस नर्क रूपी ससुराल से तो उसे अच्छा ही लग रहा था,तब काम की तलाश में उस शहर में भटक रही होती है कि उसके रास्ते में सतीश उसे ढूंढता आ जाता है। सतीश के साथ उसका दोस्त भी था जिसने बिछियां को यहाँ शहर में भटकता देख अपनी दोस्ती धर्म का पालन करते हुये सतीश को बिछियां के इस शहर में दिखने की ख़बर दी होती है। बिछियां उन्हें देख भागने की कोशिश करती है वह भागते-भागते शहर के ही पुलिस थाने पहुँच जाती है। उसी के पीछे-पीछे सतीश और उसका दोस्त भी पुलिस थाने आ जाते है। बिछियां दौड़कर टेबल कुर्सी पर बैठे हेड साहब के सामने जाकर घबराते हुए और हक़लाते हुए कहती है- मुझे बचा लो साहब यह मुझे मार डालेगा।

हेड साहब- अरे क्या हुआ? किसकी मज़ाल जो पुलिस थाने में ऐसी हरक़त करे।

बिछियां-साहब वो मेरा पति... मुझे मार डालेगा बचा लो।

हेड साहब- तू चिंता न कर हम है ना।

ऐसा कहकर दूर खड़े सतीश को आवाज़ देकर हेड साहब पास बुलाता है। 

हेड साहब- क्यों रे? औरत पर हाथ उठाते शर्म नहीं आती।अभी जेल में डाल दूंगा न सारी मर्दानगी यही निकल जायेगी।

सतीश- माफ़ी हुजूर!गलती हो गयी माफ़ कर दो। अब कभी ऐसा नहीं करूंगा। यह मायके जाने की ज़िद कर रही थी मेरे पास पैसे है नहीं तो कैसे ले जाता। यह मानी नहीं तो गुस्से में हाथ उठ गया और यह यहाँ आ गयी।

हेड साहब सतिश को शक की निगाह से घूरते हुये कहते है- अच्छा! क्या बेटी यह सच कह रहा है?

बिछियां लोक लॉज के कारण कल रात वाली बात नहीं बता पाती है और नीचे सर कर लेती है। हेड साहब यह देख समझता है कि घरेलू छोटा सा मामला है समझा बुझाकर घर भेज देता हूँ और इसके पति से कुछ पैसे भी मिल जायेंगे केस न बनाने पर।

सतीश और उस हेड साहब के बीच कुछ सौदेबाजी हो जाती है और सतीश, बिछियां और उसकी बच्ची को लेकर घर  आ जाता हैं।

अगली सुबह सतीश के घर के बाहर पुलिस की गाड़ी खड़ी है, भीड़ उसके घर के अंदर झाँकने की कोशिश कर रही है।  हवलदार अड़ोस पड़ोस से पूछताछ कर रहे है?

घर के अंदर सब सामान अस्त व्यस्त पड़ा है जैसे यहाँ रात को हाथापाई हुई हो, घर में झोली से थोड़ी दूर बिछियां की बेटी की लाश पढ़ी हुई है और उसी से थोड़ी दूरी पर  बिछियां की लाश को कमरे के बीच पड़े हुए वह शहर के थाने का हेड साहब देख रहा है।

-हिम

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

झूठ

संयुक्त परिवार के एक पुराने से घर के रसोईघर में दोनों बहुएं खाना बना रही है। सास बरामदे में लगे झूले पर बड़ी बहू से हुए पोते को गोद में लेकर बैठी है। सात साल की रिंकी अपनी बुआ के साथ बरामदे में ही स्कूल से मिले हुए काम को कर रही थी।खाना बन चुका था, बड़ी बहू ने सबको थाली में खाना परोस दिया। सबने खाना खाया रोज की तरह आदतन सास ने खाने में जो छोटी बहू ने बनायी दाल थी उसमें कुछ कमियाँ गिनायी। छोटी बहू ने भी रोज की तरह सर नीचे कर स्वीकार कर -'आगे से नहीं होगा' कहाँ और रसोईघर में जाकर बर्तन जल्दी से धोने लगी। तभी वहाँ रिंकी आती है और कहती है-"चाची आज आप खाना क्यों नहीं खा रहे हो?"

इस बात का जवाब बड़ी बहू ने दिया-'तेरी चाची आज अपने घर जाने वाली है तो खुशी के कारण भूख प्यास सब गायब है।'

छोटी बहू कुछ न कह कर अपना काम जारी रखती है।

उसके पति तो अपने बिज़नेस के काम से 20 दिन के लिये बाहर गये हुए है तो उसके पति ने ही बाबूजी और माँ से उसके मायके जाने की सिफारिश कर दी थी। ट्रेन का समय हो रहा था इसीलिए उसने जल्दी से सब काम खत्म कर सारा सामान अपने बैग में जमा कर लिया और जाने को तैयार हो गयी।

अभी घर में बाबूजी और उसके जेठ तो नहीं थे इसीलिये उसकी ननद ही सास के कहने पर उसे रेल्वे स्टेशन छोड़ने आयी थी।

उसके डब्बे की तय सीट पर बैठा कर ट्रेन के जाने तक उसकी ननद रुकी। ट्रेन चल पढ़ी थी सफ़र शुरू हुआ।

ट्रेन इंदौर से चलकर उज्जैन पहुँची ही थी कि अभी तक जो उसके पास वाली सीट जो अब तक खाली थी, उस पर उसके परिचित-सा चेहरे वाला शख्स आकर बैठ जाता हैं और उससे कहता है-"तुम हिम्मत करके आख़िर आ ही गयी सीता।"

सीता-"क्यों न आती,आना तय था;कॉलेज के समय से आज तक कभी तुम्हारी बात टाली है क्या मैंने सुमित?"

सुमित-"सही है सिवाय एक बात को छोड़कर।"

सीता-"अब उस बात को लेकर उदास मत हो, हम अभी साथ है न तो इस पल को ही जियो।"

सुमित-" ठीक है।"

दोनों जिस ट्रेन में बैठे थे वह ट्रेन देहरादून जा रही थी।

सीता खिड़की से बाहर ऐसे देख रही थी जैसे एक अलग दुनिया का नज़ारा उसे देखने को मिल रहा हो।

सुमित उसे देख कर सोच रहा था कि दो साल पहले जब हम कॉलेज के सब दोस्त मसूरी गये थे तब वाली सीता उसे उस खिड़की से बाहर देखते हुये दिख रही थी।

ट्रेन एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन की दूरी तय करती चली गयी और अंत में देहरादून पहुँच गयी।

दोनों स्टेशन पर उतरे,सुमित के पास सिर्फ एक छोटा सा बेग था पर सीता अपने ससुराल से मायके जाने को आयी थी तो उसका बेग भारी था।सीता के ट्राली बैग को हाथ में लिये सीता का हाथ अपने दूसरे हाथ में लिये सुमित सीता को लेकर स्टेशन से बाहर आ गये। स्टेशन के पास ही देहरादून में बस स्टैंड भी है और वही टैक्सी स्टैंड भी है।

सुमित ने अपना मोबाइल निकालकर किसी नम्बर को ढूंढ, उस पर कॉल किया। 

थोड़ी ही देर में ड्रायवर गाड़ी लेकर उनके सामने आ गया था।

सुमित ने उसे देख कहा-" दिलीप भाई कैसे हो?"

दिलीप-"अच्छा हूँ साहब,अरे वाह! आप दोनों ने शादी कर ही ली।"

दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुरा दिये।

दिलीप वहीं ड्राइवर था जो कॉलेज के समय में इन सारे दोस्तों को घुमने के लिये अपनी गाड़ी को रेंट पर दी थी तब ही से सुमित ने उसके नम्बर सेव किये हुए थे।

दिलीप ने सुमित के हाथ से बैग लेकर डिक्की में सारा सामान रखा।दोनों गाड़ी के पीछे वाली सीट पर बैठ गए। अब देहरादून से मसूरी सिर्फ 34 कि.मी.दूर है।गाड़ी सर्पीले रास्ते से होते हुए मसूरी की ओर बढ़ती गयी। मसूरी में दिलीप ने उन दोनों के लिये अपने पहचान के हॉटल में कमरा ठीक करवा ही दिया था।हॉटल पर दोनों को छोड़ा और अगले दिन सुबह आने का और दोनों को घूमाने का कह कर चला गया।

सीता हॉटल की बालकनी से शाम के समय पहाड़ के पीछे सूर्यास्त का नज़ारा देख रही थी।तभी सुमित चाय लेकर आता है और सीता की और बढ़ाता है।

सीता उसकी तरफ देखें बिना ही चाय का कप ले लेती है और कहती है:-"पिछले एक साल से पहली बार किसी और ने मुझे चाय ला कर दी है,शुक्रिया।"

सुमित थोड़ा हँसता हुआ कहता है कि-" यहाँ आकर भी तुम अपने ससुराल में रहना चाहती हो क्या? जो उन बातों का जिक्र कर रही हो।"

सीता:-"नहीं पर, चलो अब कोई बात न कहूंगी वहाँ की। सुमित हम वॉक पर चले क्या? थोड़ा मॉल रोड़ घूम कर आते है।"

सुमित ने कहा-"ठीक है।मैं बाहर जाता हूँ तुम कपड़े बदल लो।"

सुमित हॉटल के बरामदे में बैठा सीता का इंतज़ार कर रहा था।सीता लाल कलर का सूट पहन कर आयी उस पर उसने काले रंग की साल ओढ़ रखी थी जो यही से खरीदकर सुमित ने दो साल पहले गिफ़्ट दी थी।

दोनों लाइब्रेरी चौक से पिक्चर पैलेस की ओर पैदल ही माल रोड़ पर चल दिये।

शाम का समय था दिसम्बर का शुरुआती महीना था, इसीलिये मसूरी में अभी कम भीड़ थी।सड़क पर नई-नई शादी हुए जोड़े घूम रहे थे।सड़क के दोनों और बहुत सी दुकानें लगी थी।दुकानों के बीच में ही जगह-जगह पर फ़ोटो खिंचवाने के लिए मंडप बना रखे है जो बहुत सुंदर रंगों से सजे हुए है।उन्ही मंडपों में से एक मंडप पर दोनों खड़े होकर दोनों हाथों में हाथ थामें आसमान को हल्का सुनहरा नीला और कालिमा लिये देख रहे है।यह वहीं जगह है जहाँ पहले भी वो दोनों घण्टों उस जादू को देखने को रुके थे जो हर दिन सूरज ढलने के बाद यहाँ से दिखायी देता है। कुछ ही मिनटों में अँधेरा होने लगता है नीचे देहरादून के मकानों में लाइट जलने लगती है ऐसा लगता है मानों वहां नीचे हजारों हीरे एक साथ चमक रहे हो। दोनों उस नज़ारे को देख फिर एक दूसरे की आँखों में देखते है। उन दोनों की आँखों में भी वहीं हीरे सी चमक एक दूसरे को दिखायी देती है जो वहाँ मण्डप से नीचे देखने वाले बाकी लोगों को दिख रही होगी, फर्क इतना है कि यह आँखों की चमक सिर्फ इन दोनों के अलावा और कोई नहीं देख सकता था।दुकान में पीछे गाना चल रहा था "दो दिल मिल रहे है मगर चुपके-चुपके" यह माहौल को और ज्यादा प्यार भरा बना रहा था। एक घण्टे तक वहाँ साथ बिताने के बाद दोनों को याद आया कि प्यार से पेट नहीं भरता कुछ खाना भी ज़रूरी है तो दोनों उन सड़कों पर घूमते हुए एक रेस्टोरेंट में जाकर खाना खाते है। खाने में सब कुछ सीता की पसंद का आर्डर सुमित ने किया था।

सीता सोच रही होती है वह सब देखकर की आख़िर बार इन एक साल में उसने अपनी पसंद का खाना कब खाया था, संयुक्त परिवार में रहते हुए उसकी अपनी निज़ी पसन्द खो गयी थी, पर सुमित को आज भी याद है यह देख वह खुश हुई।

दोनों खाना खा कर वापस हॉटल चल दिये थे।

हॉटल पहुँच कर दोनों जल्दी ही सो गये क्योंकि उन्हें सुबह घूमना भी था।

सुबह सीता को अपने चहरे पर धूप का एहसास हुआ तब वह उठने लगी तो सुमित यह देख दौड़कर खिड़की से आती इन सूरज की किरणों को पर्दे से कमरे में प्रवेश करने से रोक देता है।

सीता यह देख कहती है-"रहने दो मैं उठने ही वाली थी।" फिर उसे याद आया कि कॉलेज के दिनों में सुबह 11 बजे उठने वाला यह सुमीत आज जल्दी 9 बजे उठकर तैयार होकर बैठा है। उसकी नज़र टेबल पर ही रखें चाय और नाश्तें पर गयी जो सुमित ने उसके उठने से पहले ही सीता के लिये बुला लिये थे।सीता आज एक साल बाद सुबह पाँच बजे न उठकर 9 बजे उठी थी।वैसे भी आज उसे कहाँ जल्दी उठकर नहाकर बाबुजी को 8 बजे चाय नाश्ता देना था।आज तो सुमित ने उसके लिये यह सब तैयार रखा था।

सीता उठी तैयार हुई, चाय सुमित ने इलेक्ट्रिक केतली से फिर गर्म कर सीता को दी और कहाँ-"मैंने दिलीप से कह दिया है,वह गाड़ी लेकर आने ही वाला होगा।"

सीता और सुमित दो दिनों तक मसूरी में घूमते रहे,उन्होंने वह सब जगह देखी जहाँ वह पहले भी आ चुके थे। इस बार पर कुछ अलग था यह उन दोनों ने अनुभव किया।

क्लाउड एन्ड में  उन्हें नए बादल दिखे जो खुशियों से भरे लगे।

कम्पनी गार्डन में फूल नए रंग लिये उनका स्वागत कर रहे थे।

बुद्धा टेम्पल पर हवाये और वह पहाड़ जैसे उन्हें कह रहे हो बड़ी देर से लौटे हो,अगली बार जल्दी लौटना।

कैम्पटी फॉल का बर्फ वाला झरना आगे आने वाले जीवन की बधाई दे रहा था।

कॉल माइनिंग घाटी के बीच बना हॉरर हॉउस उन्हें कह रहा था दोनों साथ में ऐसे ही रहना, देखों मैं यहाँ अकेला हूँ तो मेरा हाल कैसा हो गया है।

इसी तरह खट्टी-मीठी यादों के साथ दोनों मसूरी से देहरादून के लिए दिलीप की गाड़ी में बैठ जाते है और रास्ते में शिव मंदिर में आरती के समय पहुँचते है। 

दिलीप बिल्कुल कुशल सारथी धर्म निभाता हुआ उन दोनों को स्टेशन पर विदाई देने आता है। दोनों ट्रेन में बैठ कर अपने सफ़र पर चल देते है।

सीता अपने ससुराल में गर्म-गर्म रोटियां बना रही है,सास वहीं झूले पर झूल रही है।बड़ी बहू रविवार का दिन होने के कारण अपने पति,ससुर, देवर और ननद को थाली में खाना परोस रही है। तभी ससुर अपने छोटे बेटे से कहते हैं -"बेटा सुमित, मैं सोच रहा था कि बहु और तुम दोनों कही घूम आओ, शादी के बाद से आज तक कही नहीं गये हो।"

सुमित:-" ठीक है बाबूजी,जैसा आप कहे।"

दूर बैठी रिंकी जो अपनी चाची का मोबाइल चला रही थी यह सुनकर चाची के मोबाइल में गाना बजा देती है।"अरे झूठ बोले कौआ काटे।" और फिर खुद ही दाँत दिखाकर हँस दी।सबका ध्यान अचानक उसके हँसने पर गया।कोई कुछ नहीं समझ पाया कि यह क्यों हँसी सिवाय सीता, सुमित और रिंकी के।

आपको पता है उसे क्यों हँसी आयी?

-हिम





मंगलवार, 8 फ़रवरी 2022

सफ़र

 सफ़र हमेशा से ही मंज़िल से बेहतर होता है जैसे किसी व्यक्ति के जीवन की मंज़िल तो मौत है और उस मंज़िल तक पहुँचने के बीच की ज़िन्दगी सफ़र है।ऐसा मैं नहीं तथागत भी कह गये है कि मंज़िल पर पहुँचने से अधिक जरूरी है ठीक से यात्रा करना एक ऐसी ही यात्रा पर था हमारी इस कहानी का नायक हिम जो अपने शहर मनावर से बाइक पर इंदौर की ओर जा रहा था। एक कान में बोट का एयर बड लगा रखा था जिस में गाना चल रहा था "मुसाफ़िर हूं यारों न घर है न ठिकाना।"गाना पूरा होने ही वाला था कि  गाने के बीच में व्यवधान डालते हुए उसके कॉल की टोन बजी।उसने सिर्फ बड को टच कर, कॉल गाड़ी चलते हुए ही उठा लिया।बिना देखे कॉल उठाया था तो उसने बोला "हैलो कौन ?" उधर से आवाज ठीक से सुनायी नहीं दी आवाज थोड़ी धीमी आ रही थी तो हिम ने गाड़ी की रफ़्तार थोड़ी धीरे कर ली। तब जो आवाज उसके कानों में शहद सी घुली वह आवाज उसकी दोस्त आरती की थी।आरती ने कहा-" हैलो हिम! तुम्हारी आवाज़ नहीं आ रही है।क्या तुम गाड़ी रोकोगे।" बस इतना सुनने की देर थी और हिम ने गाड़ी रोक दी। हिम ने कहा-" अब आवाज़ ठीक से आ रही है आरती।आरती ने ज़वाब दिया:-" हाँ।अब बेहतर है,हिम तुम कहाँ हो।हिम ने कहा:-"इंदौर की तरफ जा रहा हूँ।"आरती ने कहा:-" यह तो तुम्हारा व्हाट्सएप स्टेटस देख कर मैं पहले ही जान गयी हूँ। पर तुम अभी कहाँ तक पहुँचे हो?"हिम ने गूगल मैप पर लोकेशन देखी और बताया कि अभी पीथमपुर आने में सिर्फ 8 किलोमीटर बाकी है।

तब आरती ने कहा:-"आज चॉकलेट डे है। मेरी चॉकलेट कहाँ है।" हिम ने सोचा वैसे भी हम 2 साल से कभी मिले तो है नहीं तो यही कह देता हूँ कि जब मिलोगे तब दूंगा।बस हिम का इतना कहना था और आरती ने कहा कि चलो फिर मैं बस से मनावर जा रही थी अब यहीं उतर रही हूँ पीथमपुर चौपाटी पर मुझे मेरी चॉकलेट दो। हिम को यकीन नहीं हुआ कि आरती ऐसा कर सकती है क्योंकि आरती के घर वाले बहुत ही रूढ़िवादी और ख़तरनाक़ है इसी कारण उन दोनों की आज तक हिम्मत नहीं हुई थी मिलने की पर आज अचानक यह हिम्मत उसमें कैसे आयी। वह सोच ही रहा था कि उसके बड में आवाज आयी आरती की:-"हिम मैं उतर गयी हूँ यहाँ। तुम कितनी देर में आओगे।" 

हिम ने कहा:-" कम से कम 10 मिनट तो लगेंगे।"

आरती ने कहा:-"जल्दी आओ मैं यही वैट कर रही हूँ।" आरती पहली बार अकेले ऐसे कही रास्तें में बस से उतरी थी उसको डर भी लग रहा था और इसी डर के कारण उन 10 मिनट में 5 बार हिम को कॉल कर चुकी थी। 6 टे कॉल तक हिम उसको रोड के उल्टी तरफ दिख जाता है। हिम भी डिवाइडर देख रोड से उसकी तरफ जाता है और देखता है कि आरती की आँखों में डर के आँसू थे या उससे पहली बार मिलने के वो अंदाज़ा ही नहीं लगा पाया।आरती ने बिल्कुल बच्चों सी मासूमियत से कहा:-" मेरी चॉकलेट दो।"हिम ने जवाब दिया:-"तू पागल है क्या? ऐसे बस से कौन उतरता है सिर्फ चॉकलेट के लिये।"

आरती:-"मैं और कौन?"

हिम जानता था वह चॉकलेट के लिये नहीं उससे सिर्फ मिलने को उतरी थी।

हिम:-"चॉकलेट तो नहीं मिली इन 8 किलोमीटर में और मैं घर से ही लेकर आता अगर मुझे पता होता तू आज अचानक यहाँ ऐसे मिल जायेगी।"

आरती:-" अब सज़ा तो मिलेगी तुझे?"

हिम:-"क्या?"

आरती:-"मुझे छोड़ने जाना पड़ेगा,खलघाट तक कम से कम।"

हिम:-"तू सच मैं पागल है।मैं इंदौर जा रहा हूँ मनावर नहीं जो तुझे छोड़ दूंगा।"

आरती:-"इतना नहीं कर सकता तू मेरे लिये।मैं देख तेरे लिये बस से उतरी हूँ और रास्ते में मुझे चॉकलेट भी दे देना।"

हिम जानता था उसकी लालच उसके साथ कुछ समय बिताने की है तभी तो उसने इतनी हिम्मत दिखायी है।

हिम:-"ठीक है। मैं तुझे खलघाट नहीं धामनोद तक छोडूंगा। खलघाट मेरा घर है तुझे पता है न। अभी ही आया हूँ दोबारा किसी ने देख लिया न तो मेरी  हैप्पी दिवाली हो जायेगी।

आरती:-"ठीक है। जहाँ छोड़ना है छोड़ देना पर साथ चल दे न थोड़ी दूर।"

उसका बोलना कि छोड़ना है छोड़ देना यहीं हिम को सुनाया।हिम ने बोला ठीक है बैठ।हिम ने अपने मोबाइल का लोकेशन फ़ीचर ऑफ़ किया ताकि उसके पापा उसकी लोकेशन न देख सके कि उनका होनहार बेटा सारथी बन अपनी रथी को छोड़ने उल्टी दिशा में चला आ रहा है।

आरती पीछे बैठी है उसके हाथ में उसका मोबाइल और जैकेट था जिन्हें उसे संभालना मुश्किल हो रहा था साइड के मिरर से हिम ने यह देख उससे उसका मोबाइल मांग कर अपने बैग के पॉकेट में रख लिया।

अब उसका ध्यान गया कि आरती ने काले कलर का टॉप पहना है जिसमें वो बहुत अच्छी लग रही है और उसके हल्के कर्ली बाल हवा में लहरा रहे है। तभी आरती की आवाज़ ने उसका ध्यान खींचा।

आरती:-"तुमको बहुत जल्दी है न मुझे छोड़ने की तभी गाड़ी इतनी तेज़ चला रहे हो।"

हिम:-"तेज़ न चलाऊंगा तो कब तुम्हें वहाँ छोडूंगा और कब समय से वापस इंदौर पहुँचूँगा।"

आरती:-"तेज़ चलने से हिम नज़ारे छूट जाते है।हम वो नज़ारे नहीं देख पाते जो देख लेते तो कुछ समय वहाँ रुक कर सुस्ता लेते।"

हिम समझ गया था वह क्या कहना चाह रही थी पर उसको इस बात का जवाब नहीं देना चाहता था और बात बदलने के लिये कहता है।

हिम:-"आगे मानपुर आयेगा वहाँ हम चाय भी पी लेंगे और थोड़ा सुस्ता भी लेंगे, ठीक है।"

आरती:-"ठीक है। पर तुमने मेरी तारीफ़ नहीं कि देखों आज हम पहली बार मिले है वो भी मेरी वज़ह से।"

हिम:-"वाकई !इतनी हिम्मत कहाँ से लायी हो?"

आरती-"जब चाल आख़िरी हो तब अपनी हिम्मत लगाना ही पड़ती है हिम।"

हिम-"मैं समझा नहीं।"

आरती -"कुछ नहीं ऐसे ही वैसे तुमको मेरे कारण अब वापस इतनी दूर जाना पड़ेगा न।"

हिम-"अब पास दूर क्या रह गया। तुम मुझसे मिलने के लिये हिम्मत जुटा सकती हो तो मैं तुम्हारे लिये इतना तो कर ही सकता हूँ।"

आरती थोड़ी खुश हुई तुम्हारे लिये इतना तो कर सकता हूँ सुन कर ही। आरती पहली बार ऐसे घर वालों से बिना बताये किसी लड़के के साथ बाइक से जा रही थी। उसे डर भी था पर हिम साथ था तो आरती के लिये वह डर खुशी से ज़्यादा महंगा नहीं लगा। आरती ने अपना एक हाथ हिम के कंधे पर रख दिया। हिम जो कभी किसी को अपने कंधे पर गाड़ी चलाते हुये हाथ रखने नहीं देता आज उसने कुछ नहीं बोला।आरती का उसके कंधे पर हाथ रखना उसकी धड़कनों को बड़ा रहा था क्योंकि पहली बार वह दोनों मिले थे इन सालों में यह पहला ही स्पर्श था।आरती उन रास्तें में आने वाले पेड़ो पहाड़ो और नदी को ऐसे देख रही थी जैसे पहली बार देख रही हो, हाँ आज नया था वो अपने सबसे अच्छे दोस्त हिम के साथ थी। वह दूरी तय करते हुए मानपुर आ गये वहाँ पटेल पैलेस पर चाय पीने के लिये रूके।

हिम :-"तुम चाय पियोगी?"

आरती:-"अच्छी होगी तो पी लूंगी। वैसे वहाँ चॉकलेट भी है। याद भी है मुझे कौन सी पसन्द है?"

हिम:-"हाँ याद हैं किटकेट। "

दुकान से 2 किटकेट हिम ने ली और दोनों उसे दे दी।

पानी की बॉटल बैग से निकाल कर पीने लगा।

हिम:-"चाय पियोगी अच्छी है।"

आरती :-"हम लेट हो जायेंगे फिर कभी।"

हिम-" ठीक है। पानी पी लो।"

आरती कभी भी बॉटल से पानी मुँह लगाये बिना पी नहीं पाती थी तब भी उसने कोशिश की ऊपर से बिना मुँह लगाये पीने की।यह देख हिम ने कहा:-"पी लो मुँह लगाकर ही। मुझे झूठा सच्चा सब चलता है।"

आरती ने पानी पी लिया तभी उसे ठीक सामने पहाड़ी पर मंदिर दिखा। उसके बारे में हिम से पूछा वहाँ क्या है?

हिम :- " आशापुर माता का मंदिर हैं। ऐसा बोलते है जो मांगों मिल जाता है।"

आरती:-"अच्छा, हम वहाँ चले मुझे भी कुछ मांगना है।"

हिम:-" जो मांगना है यहीं से मांग लो वहाँ जायेंगे तो देर हो जायेगी।"

आरती ने वहीं हाथ जोड़ कर कुछ मांगा और दोनों गाड़ी से चल दिये। 

आरती:-"तुमने कुछ क्यों नहीं मांगा।"

हिम:-"अरे उनको उनकी मर्जी से देने दो। हम माँगेंगे तो कम माँग लेंगे वो देंगे तो ज्यादा दे सकते है।"

आरती:-"सही है।पर तुमने कुछ तो मांगा है ,मुझसे झूठ कहाँ छुपता है तुम्हारा,बताओ न!"

हिम:-" हाँ माँगा कि जो पगली मेरे साथ सफ़र कर रही है उसके लिये जो सही हो वो उसे मिल जाये।"

आरती:-"जो सही हो? तुम सही नहीं हो क्या?"

हिम सोचता रह गया ।

हिम:-"नहीं शायद इसीलिये तो माँगा जो सही हो वो मिल जाये।"

आरती ने अपना सर हिम की पीठ पर टिका दिया।शायद गले लगाना चाहती थी पर नहीं लगा सकी।माहौल को हल्का करने के लिये कहता है।

हिम:-"चॉकलेट तो खिला जब नहीं थी तब माँग रही थी अब है तो बचा कर रख रही है अकेले खायेगी।"

आरती:- "एक खा लेते है दूसरी तुझसे भी शेयर नहीं करने वाली हूँ।"आरती ने अपने हाथ से हिम को पहला बाइट दिया किटकेट का और फिर उसने खा लिया।

हिम को याद आया अचानक की वह दोनों आज तक किसी भी फ़ोटो में साथ नहीं है। पहली बार ही वो दोनों दुनिया में एक साथ एक सफ़र पर थे तो मौके का फ़ायदा उठा कर हिम ने चलती गाड़ी से ही फोन एक हाथ से निकाल कर फ़ोटो ले ली। आरती मना करने लगी कि वो अच्छी नहीं दिख रही पर हिम यह मौका थोड़ी जाने देने वाला और ऐसे पहली बार एक फ़ोटो में दोनों साथ नज़र आये।

समय काफ़ी जल्द कट रहा था ऐसा आरती और हिम दोनों को लग रहा था।

आरती :-"अब धामनोद कितनी दूर है?"

हिम:-" अब से बस 15 मिनट।"

सिर्फ 15 मिनट सोच आरती को अच्छा नहीं लगा वो चाहती थी कि यह सफ़र खत्म न हो।

जैसे-जैसे धामनोद पास आया वो दोनों दूर होते गये। समय जहाँ 2 घण्टे ही लगना था वहाँ पर 3 घण्टे लग चुका था। बस स्टैंड पर जा कर पता चला बस अभी देर से जायेगी।

आरती के चेहरे पर परेशानी देख समझ गया और बोला।

हिम:-"सारथी बना हूँ आज के लिये तुम्हारा ऐसे रथी को बीच सफ़र में छोड़कर थोड़ी जाऊँगा। देखो इस बस से पहले तुम्हें कम से कम धरमपुरी तक छोड़ दूंगा।"

आरती:-"काश तुम हमेशा मेरे जीवन के सारथी रहते।"

यह बात आरती के मुँह से तो निकली पर हिम के कान तक नहीं पहुँच पायी।

दोनों धरमपुरी तक सिर्फ 20 मिनट में पहुँच गये थे और पीछे से आ रही इंदौर गाड़ी का इंतज़ार करने लगे तब ही आरती ने अपने बैग से एक कार्ड निकाला और हिम को दे दिया और कहा- "मेरे जाने के बाद लिफ़ाफ़ा खोलना।"

हिम:-"ठीक है।फिर बाद में मिलेंगे।"

बस पीछे से आयी आरती गाड़ी में बैठी और चले गयी, जल्द बाज़ी में जो दूसरी किटकेट थी जो वो हिम से शेयर तक नहीं करने वाली थी वह हिम के हाथ में ही रह गयी।गाड़ी के जाने के बाद जब लिफ़ाफ़ा खोला उसमें लिखा था 

(विनोद संग आरती)

हिम ने पत्रिका देखी अपने बैग में रखी और फिर इंदौर की और निकलने लगा और अपने ईयर बड में गाना शुरू करने के लिए क्लिक किया और उधर से गाने के बोल उसे सुनायी दिए- "लग जा गले के फिर ये हँसी रात हो न हो..शायद फिर इस जन्म में मुलाकात हो न हो...।"

-हिमांशु मंगला वर्मा "हिम"



मन

 इंदौर के भंवरकुआं के पास भोलाराम मार्ग पर कुछ अपने ख़ुद के सपने लिये, तो कुछ अपने अभिभावकों द्वारा चुनें गये सपने लिये और तो कुछ दूसरों की स...