गाँव की एक मात्र पक्की सड़क जिस पर आमतौर पर इक्का दुक्का ही गाड़िया चलती है और बाकी समय सड़क इतनी खाली रहती की सड़क से लगें विद्यालय के बच्चें उस पर खेल खेला करते हैं, अभी उसी पक्की सड़क पर कच्चे सपनों को लिये कई बच्चें अपने घर की ओर जा रहे है। उन्हीं में बिछियां,लाली और ज्योति तीनों बारहवीं कक्षा की सहेलियाँ धीरे-धीरे कदम रख बातें करती हुई अपने घर की राह पर चले जा रहे है।
लाली अपनी सहेली बिछियां से पूछती है- तूने तो आज गणित के मेडम के दिये पर्चे में कमाल कर दिया।
बिछियां - हाँ, मुझे पसंद है न इसीलिये। फिर मुझे भी तो मेडम की तरह स्कूल में पढ़ाना है, मुझे ही न आयेगा तो बच्चें हँसेंगे न मुझ पर।
"हाँ, जैसे आज दिन में वो अंग्रेजी वाले मास्टरजी पर सब हँस रहे थे जब उन्होंने इंग्लिश की स्पेलिंग ही गलत लिख दी थी।" हँसते हुए ज्योति कहने लगी।
तीनों कक्षा की आज दिनभर में घटी घटनाओं पर चर्चा करती हुई कब अपने घर के सामने पहुँच गयी उन्हें पता ही नहीं चला।
घर के बाहर बिछियां को आँगन में बहुत से जूते देखने को मिले, वह सोच ही रही थी कि यह कौन मेहमान आये होंगे इतने में ही उसकी माँ घड़ी में समय देख पीछे के दरवाज़े से बाहर आ, उसे पीछे के दरवाज़े से अंदर ले गयी।
यह इतनी जल्दी हुआ कि बिछियां समझ ही नहीं पायी कि आज माँ पहली बार उसको ऐसे स्कूल से देर से आने पर आते ही बिना डाँटे घर में ले जाकर कपड़े अपने हाथों से क्यों बदल रही है।
बिछिया की माँ उसे साड़ी पहना देती है और घर में आये मेहमानों को पानी पिलाने को भेजती है। उसे यह अजीब लगता है कि जो माँ उसके खेल-खेल में साड़ी पहनने पर डाँटती थी वह आज खुद उसे साड़ी पहनाकर इन लोगों के सामने क्यों भेज रही हैं?
वो पानी पिलाकर जैसे वापिस अंदर कमरे में जाने को होती है कि उसे पीछे से लोगों में से किसी थोड़े बूढ़े की बात सुनायी देती है जो उसके बापू को कहता है कि - लड़की तो सुंदर है, हमारे सतीश के साथ खूब जोड़ी जमेगी।
तभी बिछियां की माँ कमरे के दरवाजे पर ही खड़ी हो कहती है- हाँ! लाखों में एक है हमारी बिछियां।
सतीश का बापू- तो हमारी तरफ से बात पक्की है। आप देख लो क्या सोचते हो।
बिछियां की माँ- बात तो तय तब ही हो गयी थी, जब यह सात बरस की थी। हमारी तरफ से भी हाँ ही है, पर आप अभी पैसे की बात कर लो, बाद की झिक-झिक न हो।
सतीश का बापू- पैसे भी तब ही तय कर दिये थे कि पच्चीस हज़ार देंगे।
बिछियां की माँ- सिर्फ पच्चीस हज़ार। महंगाई भी तो देखों पचास हज़ार से एक रुपया कम नहीं लेंगे और हमारी बेटी में कोई खोट थोड़े है जो हमें ब्याह की जल्दी हो। पचास हजार मंजूर हो तो बात पक्की।
सतीश का बापू- ठीक है, तय रहा सौदा।
इस तरह बिछियां की शादी तय हो जाती है पड़ोस के गाँव के सतीश के साथ जो दसवीं की कक्षा में चार बार फैल था।
इस तरह की सोदेबाज़ी वाली शादियां बड़े धूमधाम से इस गाँव में पहले भी कई बार हो चुकी थी उन्हीं शादियों की संख्या में एक और अंक का इज़ाफ़ा इस शादी के बाद हो जाता है।
शादी के बाद बिछियां जो कल तक ख़ुद व्यवस्थित नहीं रहा करती थी आज अपने ससुराल को व्यवस्थित करने के जतन में लगी रहती थी। घर में माँ के सिखाये रसोई के सब तरीकों का इस्तेमाल कर अपने ससुराल के सभी सदस्यों को ख़ुश करने की नाकामियाब कोशिश करती थक जाती थी।
ऐसे ही शादी के चार साल बीत जाते हैं इन चार सालों में एक बार भी वह अपने मायके नहीं जा पायी हैं, उसके सास ससुर भी अब इस दुनिया में नहीं रहे हैं। घर में अब सिर्फ उसका पति, उसकी छः माह की बच्ची और जो उस बच्ची के जन्म देने से लगभग मृत्युशैया से जिंदा लौटी बिछियां ही बाकी हैं।
बिछियां रोज सुबह-शाम उसके पति के मन पसन्द का खाना बनाती और उसके इस उपक्रम के बदले में उसका पति सतीश जो शराब के नशे में अपनी पत्नी जिसे वह सिर्फ पैसे देकर ख़रीदी हुई एक वस्तु के अलावा ज्यादा कुछ नहीं मानता था कि पिटाई इस गुस्से में करता था जैसे जुएँ में जो वह पैसे रोज हार के आता था उसकी जिम्मेदार यह बिछियां ही हो।
आज करवाचौथ का दिन है पर बिछियां के लिये हर रात जैसे अमावस की होती है पर उसने अपने इस पति की दीर्घायु के लिये करवा चौथ का व्रत कर लिया था।
रात तो उसका पति किसी औरत को ही अपने साथ घर में ले आता है, यह देख दिनभर से भूखी प्यासी बिछियां गुस्से में आ कर उस औरत को गाली गलौच कर घर से बाहर करने का प्रयास करती है, उस अधमरी सी शरीर वाली बिछियां में इससे ज्यादा शक्ति थी भी नहीं कि वह और कुछ प्रयास कर पाती।
उसके पति सतीश को अपनी पत्नी की इस बत्तमीजी पर बहुत क्रोध आ जाता है और वह उसके किये की सज़ा देने के लिये अपने पौरुष का प्रदर्शन करते हुए उसे बेल्ट से बेल्ट के टूटने तक मारता है।
वह बेहोश होने से पहले सिर्फ इतना देख पाती है कि उसका पति और वह औरत कमरें में चले जाते हैं और उसका पति कमरें का दरवाज़ा बन्द कर लेता है उसके बाद उसकी आँखें भी बंद हो जाती है और उसके कानों में उसकी बच्ची जो शायद दूध पीने के लिए रो रही है उसकी आवाज़ ही सुनायी देती है और पता नहीं चलता कब वह आवाज़ भी सुनायी देना बंद हो जाती है।
सुबह जब उसको होश आता है तब दिन के क़रीब ग्यारह बजे थे, घर में उसके और उसकी बेटी जो रात में भूख के कारण रोती-रोती ख़ुद ही सो गयी थी के अलावा कोई नहीं था। वह बीती रात के बारे में सोच कर हिम्मत कर घर से भागने की सोचती है और बच्ची को लेकर घर से निकल जाती है।
वह बस में बैठ पास के शहर पहुँच जाती है वह शहर ज्यादा बड़ा नहीं था पर उसके मायके और उस नर्क रूपी ससुराल से तो उसे अच्छा ही लग रहा था,तब काम की तलाश में उस शहर में भटक रही होती है कि उसके रास्ते में सतीश उसे ढूंढता आ जाता है। सतीश के साथ उसका दोस्त भी था जिसने बिछियां को यहाँ शहर में भटकता देख अपनी दोस्ती धर्म का पालन करते हुये सतीश को बिछियां के इस शहर में दिखने की ख़बर दी होती है। बिछियां उन्हें देख भागने की कोशिश करती है वह भागते-भागते शहर के ही पुलिस थाने पहुँच जाती है। उसी के पीछे-पीछे सतीश और उसका दोस्त भी पुलिस थाने आ जाते है। बिछियां दौड़कर टेबल कुर्सी पर बैठे हेड साहब के सामने जाकर घबराते हुए और हक़लाते हुए कहती है- मुझे बचा लो साहब यह मुझे मार डालेगा।
हेड साहब- अरे क्या हुआ? किसकी मज़ाल जो पुलिस थाने में ऐसी हरक़त करे।
बिछियां-साहब वो मेरा पति... मुझे मार डालेगा बचा लो।
हेड साहब- तू चिंता न कर हम है ना।
ऐसा कहकर दूर खड़े सतीश को आवाज़ देकर हेड साहब पास बुलाता है।
हेड साहब- क्यों रे? औरत पर हाथ उठाते शर्म नहीं आती।अभी जेल में डाल दूंगा न सारी मर्दानगी यही निकल जायेगी।
सतीश- माफ़ी हुजूर!गलती हो गयी माफ़ कर दो। अब कभी ऐसा नहीं करूंगा। यह मायके जाने की ज़िद कर रही थी मेरे पास पैसे है नहीं तो कैसे ले जाता। यह मानी नहीं तो गुस्से में हाथ उठ गया और यह यहाँ आ गयी।
हेड साहब सतिश को शक की निगाह से घूरते हुये कहते है- अच्छा! क्या बेटी यह सच कह रहा है?
बिछियां लोक लॉज के कारण कल रात वाली बात नहीं बता पाती है और नीचे सर कर लेती है। हेड साहब यह देख समझता है कि घरेलू छोटा सा मामला है समझा बुझाकर घर भेज देता हूँ और इसके पति से कुछ पैसे भी मिल जायेंगे केस न बनाने पर।
सतीश और उस हेड साहब के बीच कुछ सौदेबाजी हो जाती है और सतीश, बिछियां और उसकी बच्ची को लेकर घर आ जाता हैं।
अगली सुबह सतीश के घर के बाहर पुलिस की गाड़ी खड़ी है, भीड़ उसके घर के अंदर झाँकने की कोशिश कर रही है। हवलदार अड़ोस पड़ोस से पूछताछ कर रहे है?
घर के अंदर सब सामान अस्त व्यस्त पड़ा है जैसे यहाँ रात को हाथापाई हुई हो, घर में झोली से थोड़ी दूर बिछियां की बेटी की लाश पढ़ी हुई है और उसी से थोड़ी दूरी पर बिछियां की लाश को कमरे के बीच पड़े हुए वह शहर के थाने का हेड साहब देख रहा है।
-हिम
बहुत खूब भाई 💐💐💐👏👏👏
जवाब देंहटाएंBadiya👌🏻😄
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छे
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया
हटाएंहमारी समाज की कड़वी सच्चाई
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया
हटाएंआज भी ये कहानी बहोत जगह सच्चाई बनी हुई है।
जवाब देंहटाएंइसीलिये इस ब्लॉग का नाम सच के करीब है।
हटाएंजय हो।।
जवाब देंहटाएंजय हो भाई
हटाएंशानदार
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया
हटाएंकड़वी सच्चाई से रूबरू करवाती कहानी..
जवाब देंहटाएंशुक्रिया,यह सिर्फ कहानी होती तो अच्छा होता
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