संयुक्त परिवार के एक पुराने से घर के रसोईघर में दोनों बहुएं खाना बना रही है। सास बरामदे में लगे झूले पर बड़ी बहू से हुए पोते को गोद में लेकर बैठी है। सात साल की रिंकी अपनी बुआ के साथ बरामदे में ही स्कूल से मिले हुए काम को कर रही थी।खाना बन चुका था, बड़ी बहू ने सबको थाली में खाना परोस दिया। सबने खाना खाया रोज की तरह आदतन सास ने खाने में जो छोटी बहू ने बनायी दाल थी उसमें कुछ कमियाँ गिनायी। छोटी बहू ने भी रोज की तरह सर नीचे कर स्वीकार कर -'आगे से नहीं होगा' कहाँ और रसोईघर में जाकर बर्तन जल्दी से धोने लगी। तभी वहाँ रिंकी आती है और कहती है-"चाची आज आप खाना क्यों नहीं खा रहे हो?"
इस बात का जवाब बड़ी बहू ने दिया-'तेरी चाची आज अपने घर जाने वाली है तो खुशी के कारण भूख प्यास सब गायब है।'
छोटी बहू कुछ न कह कर अपना काम जारी रखती है।
उसके पति तो अपने बिज़नेस के काम से 20 दिन के लिये बाहर गये हुए है तो उसके पति ने ही बाबूजी और माँ से उसके मायके जाने की सिफारिश कर दी थी। ट्रेन का समय हो रहा था इसीलिए उसने जल्दी से सब काम खत्म कर सारा सामान अपने बैग में जमा कर लिया और जाने को तैयार हो गयी।
अभी घर में बाबूजी और उसके जेठ तो नहीं थे इसीलिये उसकी ननद ही सास के कहने पर उसे रेल्वे स्टेशन छोड़ने आयी थी।
उसके डब्बे की तय सीट पर बैठा कर ट्रेन के जाने तक उसकी ननद रुकी। ट्रेन चल पढ़ी थी सफ़र शुरू हुआ।
ट्रेन इंदौर से चलकर उज्जैन पहुँची ही थी कि अभी तक जो उसके पास वाली सीट जो अब तक खाली थी, उस पर उसके परिचित-सा चेहरे वाला शख्स आकर बैठ जाता हैं और उससे कहता है-"तुम हिम्मत करके आख़िर आ ही गयी सीता।"
सीता-"क्यों न आती,आना तय था;कॉलेज के समय से आज तक कभी तुम्हारी बात टाली है क्या मैंने सुमित?"
सुमित-"सही है सिवाय एक बात को छोड़कर।"
सीता-"अब उस बात को लेकर उदास मत हो, हम अभी साथ है न तो इस पल को ही जियो।"
सुमित-" ठीक है।"
दोनों जिस ट्रेन में बैठे थे वह ट्रेन देहरादून जा रही थी।
सीता खिड़की से बाहर ऐसे देख रही थी जैसे एक अलग दुनिया का नज़ारा उसे देखने को मिल रहा हो।
सुमित उसे देख कर सोच रहा था कि दो साल पहले जब हम कॉलेज के सब दोस्त मसूरी गये थे तब वाली सीता उसे उस खिड़की से बाहर देखते हुये दिख रही थी।
ट्रेन एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन की दूरी तय करती चली गयी और अंत में देहरादून पहुँच गयी।
दोनों स्टेशन पर उतरे,सुमित के पास सिर्फ एक छोटा सा बेग था पर सीता अपने ससुराल से मायके जाने को आयी थी तो उसका बेग भारी था।सीता के ट्राली बैग को हाथ में लिये सीता का हाथ अपने दूसरे हाथ में लिये सुमित सीता को लेकर स्टेशन से बाहर आ गये। स्टेशन के पास ही देहरादून में बस स्टैंड भी है और वही टैक्सी स्टैंड भी है।
सुमित ने अपना मोबाइल निकालकर किसी नम्बर को ढूंढ, उस पर कॉल किया।
थोड़ी ही देर में ड्रायवर गाड़ी लेकर उनके सामने आ गया था।
सुमित ने उसे देख कहा-" दिलीप भाई कैसे हो?"
दिलीप-"अच्छा हूँ साहब,अरे वाह! आप दोनों ने शादी कर ही ली।"
दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुरा दिये।
दिलीप वहीं ड्राइवर था जो कॉलेज के समय में इन सारे दोस्तों को घुमने के लिये अपनी गाड़ी को रेंट पर दी थी तब ही से सुमित ने उसके नम्बर सेव किये हुए थे।
दिलीप ने सुमित के हाथ से बैग लेकर डिक्की में सारा सामान रखा।दोनों गाड़ी के पीछे वाली सीट पर बैठ गए। अब देहरादून से मसूरी सिर्फ 34 कि.मी.दूर है।गाड़ी सर्पीले रास्ते से होते हुए मसूरी की ओर बढ़ती गयी। मसूरी में दिलीप ने उन दोनों के लिये अपने पहचान के हॉटल में कमरा ठीक करवा ही दिया था।हॉटल पर दोनों को छोड़ा और अगले दिन सुबह आने का और दोनों को घूमाने का कह कर चला गया।
सीता हॉटल की बालकनी से शाम के समय पहाड़ के पीछे सूर्यास्त का नज़ारा देख रही थी।तभी सुमित चाय लेकर आता है और सीता की और बढ़ाता है।
सीता उसकी तरफ देखें बिना ही चाय का कप ले लेती है और कहती है:-"पिछले एक साल से पहली बार किसी और ने मुझे चाय ला कर दी है,शुक्रिया।"
सुमित थोड़ा हँसता हुआ कहता है कि-" यहाँ आकर भी तुम अपने ससुराल में रहना चाहती हो क्या? जो उन बातों का जिक्र कर रही हो।"
सीता:-"नहीं पर, चलो अब कोई बात न कहूंगी वहाँ की। सुमित हम वॉक पर चले क्या? थोड़ा मॉल रोड़ घूम कर आते है।"
सुमित ने कहा-"ठीक है।मैं बाहर जाता हूँ तुम कपड़े बदल लो।"
सुमित हॉटल के बरामदे में बैठा सीता का इंतज़ार कर रहा था।सीता लाल कलर का सूट पहन कर आयी उस पर उसने काले रंग की साल ओढ़ रखी थी जो यही से खरीदकर सुमित ने दो साल पहले गिफ़्ट दी थी।
दोनों लाइब्रेरी चौक से पिक्चर पैलेस की ओर पैदल ही माल रोड़ पर चल दिये।
शाम का समय था दिसम्बर का शुरुआती महीना था, इसीलिये मसूरी में अभी कम भीड़ थी।सड़क पर नई-नई शादी हुए जोड़े घूम रहे थे।सड़क के दोनों और बहुत सी दुकानें लगी थी।दुकानों के बीच में ही जगह-जगह पर फ़ोटो खिंचवाने के लिए मंडप बना रखे है जो बहुत सुंदर रंगों से सजे हुए है।उन्ही मंडपों में से एक मंडप पर दोनों खड़े होकर दोनों हाथों में हाथ थामें आसमान को हल्का सुनहरा नीला और कालिमा लिये देख रहे है।यह वहीं जगह है जहाँ पहले भी वो दोनों घण्टों उस जादू को देखने को रुके थे जो हर दिन सूरज ढलने के बाद यहाँ से दिखायी देता है। कुछ ही मिनटों में अँधेरा होने लगता है नीचे देहरादून के मकानों में लाइट जलने लगती है ऐसा लगता है मानों वहां नीचे हजारों हीरे एक साथ चमक रहे हो। दोनों उस नज़ारे को देख फिर एक दूसरे की आँखों में देखते है। उन दोनों की आँखों में भी वहीं हीरे सी चमक एक दूसरे को दिखायी देती है जो वहाँ मण्डप से नीचे देखने वाले बाकी लोगों को दिख रही होगी, फर्क इतना है कि यह आँखों की चमक सिर्फ इन दोनों के अलावा और कोई नहीं देख सकता था।दुकान में पीछे गाना चल रहा था "दो दिल मिल रहे है मगर चुपके-चुपके" यह माहौल को और ज्यादा प्यार भरा बना रहा था। एक घण्टे तक वहाँ साथ बिताने के बाद दोनों को याद आया कि प्यार से पेट नहीं भरता कुछ खाना भी ज़रूरी है तो दोनों उन सड़कों पर घूमते हुए एक रेस्टोरेंट में जाकर खाना खाते है। खाने में सब कुछ सीता की पसंद का आर्डर सुमित ने किया था।
सीता सोच रही होती है वह सब देखकर की आख़िर बार इन एक साल में उसने अपनी पसंद का खाना कब खाया था, संयुक्त परिवार में रहते हुए उसकी अपनी निज़ी पसन्द खो गयी थी, पर सुमित को आज भी याद है यह देख वह खुश हुई।
दोनों खाना खा कर वापस हॉटल चल दिये थे।
हॉटल पहुँच कर दोनों जल्दी ही सो गये क्योंकि उन्हें सुबह घूमना भी था।
सुबह सीता को अपने चहरे पर धूप का एहसास हुआ तब वह उठने लगी तो सुमित यह देख दौड़कर खिड़की से आती इन सूरज की किरणों को पर्दे से कमरे में प्रवेश करने से रोक देता है।
सीता यह देख कहती है-"रहने दो मैं उठने ही वाली थी।" फिर उसे याद आया कि कॉलेज के दिनों में सुबह 11 बजे उठने वाला यह सुमीत आज जल्दी 9 बजे उठकर तैयार होकर बैठा है। उसकी नज़र टेबल पर ही रखें चाय और नाश्तें पर गयी जो सुमित ने उसके उठने से पहले ही सीता के लिये बुला लिये थे।सीता आज एक साल बाद सुबह पाँच बजे न उठकर 9 बजे उठी थी।वैसे भी आज उसे कहाँ जल्दी उठकर नहाकर बाबुजी को 8 बजे चाय नाश्ता देना था।आज तो सुमित ने उसके लिये यह सब तैयार रखा था।
सीता उठी तैयार हुई, चाय सुमित ने इलेक्ट्रिक केतली से फिर गर्म कर सीता को दी और कहाँ-"मैंने दिलीप से कह दिया है,वह गाड़ी लेकर आने ही वाला होगा।"
सीता और सुमित दो दिनों तक मसूरी में घूमते रहे,उन्होंने वह सब जगह देखी जहाँ वह पहले भी आ चुके थे। इस बार पर कुछ अलग था यह उन दोनों ने अनुभव किया।
क्लाउड एन्ड में उन्हें नए बादल दिखे जो खुशियों से भरे लगे।
कम्पनी गार्डन में फूल नए रंग लिये उनका स्वागत कर रहे थे।
बुद्धा टेम्पल पर हवाये और वह पहाड़ जैसे उन्हें कह रहे हो बड़ी देर से लौटे हो,अगली बार जल्दी लौटना।
कैम्पटी फॉल का बर्फ वाला झरना आगे आने वाले जीवन की बधाई दे रहा था।
कॉल माइनिंग घाटी के बीच बना हॉरर हॉउस उन्हें कह रहा था दोनों साथ में ऐसे ही रहना, देखों मैं यहाँ अकेला हूँ तो मेरा हाल कैसा हो गया है।
इसी तरह खट्टी-मीठी यादों के साथ दोनों मसूरी से देहरादून के लिए दिलीप की गाड़ी में बैठ जाते है और रास्ते में शिव मंदिर में आरती के समय पहुँचते है।
दिलीप बिल्कुल कुशल सारथी धर्म निभाता हुआ उन दोनों को स्टेशन पर विदाई देने आता है। दोनों ट्रेन में बैठ कर अपने सफ़र पर चल देते है।
सीता अपने ससुराल में गर्म-गर्म रोटियां बना रही है,सास वहीं झूले पर झूल रही है।बड़ी बहू रविवार का दिन होने के कारण अपने पति,ससुर, देवर और ननद को थाली में खाना परोस रही है। तभी ससुर अपने छोटे बेटे से कहते हैं -"बेटा सुमित, मैं सोच रहा था कि बहु और तुम दोनों कही घूम आओ, शादी के बाद से आज तक कही नहीं गये हो।"
सुमित:-" ठीक है बाबूजी,जैसा आप कहे।"
दूर बैठी रिंकी जो अपनी चाची का मोबाइल चला रही थी यह सुनकर चाची के मोबाइल में गाना बजा देती है।"अरे झूठ बोले कौआ काटे।" और फिर खुद ही दाँत दिखाकर हँस दी।सबका ध्यान अचानक उसके हँसने पर गया।कोई कुछ नहीं समझ पाया कि यह क्यों हँसी सिवाय सीता, सुमित और रिंकी के।
आपको पता है उसे क्यों हँसी आयी?
-हिम
Haha, badhiya kahani hai💝💝
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया
हटाएंBahut hi sundar kahani hai👌🏻🥰
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया
हटाएंप्यारा लिखा है ❤️
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया भाई
जवाब देंहटाएंBrouhhh ✌️🤗
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया
जवाब देंहटाएंजय हो बोस
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया भाई
हटाएंआपकी लिखावट ने बहूत सही ढंग से कहानी के हर चित्र को आंखों के सामने रख दिया👏
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया
जवाब देंहटाएं👌🏻 बढ़िया
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया
जवाब देंहटाएंBadia.....bhaiya
जवाब देंहटाएंअपन चारो को भी add कर ही देता!
जवाब देंहटाएंशुभ शुरुआत 😊